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Wednesday, October 30, 2013

कोशिश



मुझे वो दर्द मेरे गुजरे पल का भुलाना  है ,

यूँही नहीं में आज तुझको धोका देती हूँ

मुझे वो आंसू पीने है अपने  करम के ,

युही ही नहीं तुझे अब गम ही देती हूँ

कभी जब आँखे उसके नाम से खुलती,

कभी जब सांसे उसकी बात से रूकती

कभी वो चल के मेरे आस पास ही होता

कभी वो दूर रह कर भी मेरा एहसास एक होता

मुझे एहसासों के जख्मो को छुपाना है

यूँही नहीं में चारसू तुझको पिरोती हूँ

मेरी ये आरज़ू है , मेरी प्रखर सी   एक कोशिश

तुझे ये कह सकू कि क्या है तेरी जरूरत

तेरी आवारगी क्या है

जन पाओगे कभी क्या तुम

यूँही नहीं  में साँसो  को अपनी तुझमे डुबोती हॊ…



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