तेरी कोमल कोपल पे में किलकित हो जाता हूँ
तेरे अधरों पर आधारित कविता तुझे सुनाता हूँ
बहते नभ से पूछा मैने
किस दिशा करू में पूर्ण वहन
जिस और महकता आँचल तेरा
वो दिशा उसे बतलाता हूँ
तेरे अधरों पर आधारित कविता तुझे सुनाता हूँ
हर व्यथा मेरी जब बढ़ जाती है
तेरा में मर्म लगाता हूँ
सजल हवा राजल से छितिज से
दूर कंही में मिलाता हूँ
तेरे अधरों पर आधारित कविता तुझे सुनाता हूँ
में नहीं था व्याकुल , नहीं था विचलित
फिर भी सम्मोहित हो जाता हूँ
तेरे आलिंगन के संशय में
सदा कंही खो जाता हूँ
तेरे अधरों पर आधारित कविता तुझे सुनाता हूँ
प्रखर हो रहे मन मंथन से
माथे पर भश्म लगाता हूँ
अब सिमट रहे स्पर्श को तेरे
विदा नहीं दे पाता हूँ
तेरे अधरों पर आधारित कविता तुझे सुनाता हूँ
@Silence Must Be heard
@Silence Must Be heard
luvd it...:-)
ReplyDeletewritten for this only :)
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